प्रियंका गांधी कांग्रेस पार्टी का नया ब्रह्मास्त्र: नज़रिया
राहुल गांधी का अपनी बहन प्रियंका गांधी को महासचिव बनाकर पूर्वी उत्तर प्रदेश की ज़िम्मेदारी देने से कार्यकर्ताओं में उत्साह हो सकता है, वो यह भी सोच सकते हैं कि यह फ़ैसला एक गेम चेंजर है.
लेकिन वास्तव में पार्टी की राजनीति का नेतृत्व एक बार फिर उस परिवार के पास पहुंच गया है, जिसके इर्द गिर्द कांग्रेस ने खुद को लंबे वक़्त से बनाए रखा है.
1960 के दशक में नेहरू और इंदिरा (पिता-पुत्री), फिर 1970 के दशक में इंदिरा-संजय (मां-छोटे बेटे) और 1980 के दशक में इंदिरा-राजीव (मां-बड़े बेटे).
गांधी परिवार के बाहर से पहली बार किसी ने कांग्रेस को चलाया तो वो थे पीवी नरसिम्हा राव. उन्होंने 1996 तक कांग्रेस पार्टी और इसकी सरकार चलाई.
लेकिन 1998 में कांग्रेस के विभाजन के बाद पार्टी की खस्ता हालत को देखते हुए सोनिया गांधी को कांग्रेस की मदद के लिए आगे आना पड़ा.
1996 से 1998 तक कांग्रेस के प्रमुख रहे गांधी परिवार के वफादार सीताराम केसरी पार्टी को साथ नहीं बांध सके थे.
सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान इसलिए संभाली क्योंकि उनके परिवार के बिना पार्टी डूब रही थी और पार्टी के बिना उनके परिवार की श्रेष्ठता और प्रासंगिकता ख़तरे में थी.
यहां से, सोनिया गांधी ने 2004 के लोकसभा चुनाव तक कांग्रेस को अखण्ड रखने में कामयाबी पाई, तब वाजपेयी सरकार ने सत्ता गंवा दी थी.
इसके बाद अगला 10 साल सोनिया-राहुल (मां-बेटे) का स्वर्णिम काल रहा. लेकिन फिर 2014 में बीजेपी के नए स्टार नरेंद्र मोदी से कांग्रेस बुरी तरह हार गई.
पार्टी को सत्ता का नुकसान काफी हद तक बड़े बड़े घोटालों और भ्रष्टाचार के कारण हुआ, इसने पार्टी की छवि को बुरी तरह धूमिल कर दिया.
तब से, सोनिया-राहुल की जोड़ी ने खुद को मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी की चुनौतियों के सामने अपर्याप्त पाया. हालांकि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की चुनावी सफलता पार्टी के खुश होने के लिए पर्याप्त कारण ज़रूर हैं.
इसी सफलता को देखते हुए अब कांग्रेस के लिए बहुत कठिन 2019 लोकसभा चुनाव से पहले गांधी परिवार ने मां-बेटे की जोड़ी की जगह सोनिया-राहुल-प्रियंका की तिकड़ी को आजमाने का फ़ैसला किया है.
हम केवल यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि देश ने चुनाव से पहले सामंती वंशवादी राजनीति के एक नए अवतार को देखा है और इससे गांधी परिवार के साथ साथ कांग्रेस पार्टी का भी बनना या बिगड़ना तय है.
इस महीने की शुरुआत में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन की घोषणा से कांग्रेस पार्टी एक बार फिर संकट में है. उत्तर प्रदेश की इन पार्टियों ने देश की इस सबसे पुरानी पार्टी को नज़रअंदाज किया.
सपा और बसपा से मिले इस सबक से कांग्रेस ने शुरुआत में उत्तर प्रदेश की सभी 80 लोकसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने की घोषणा की लेकिन फिर इसने कहा कि वो अन्य समान विचारधारा वाली पार्टियों के साथ गठबंधन के लिए तैयार है.
गांधी परिवार ने 'प्रभुत्व के सिद्धांत' के अनुसार आम कार्यकर्ताओं के सामने 'पारम्परिक प्रभुत्व' को ला खड़ा किया है.
यह दिखाने के लिए कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है, पार्टी के पास एकमात्र विकल्प था कि वो प्रियंका को उतारे और बाकी का काम मीडिया का ध्यान कर देगा.
आधिकारिक रूप से पहली बार प्रियंका गांधी को पार्टी में कोई काम सौंपा गया है. अब तक, वो अपनी मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी के दो लोकसभा क्षेत्रों रायबरेली और अमेठी में चुनाव मैनेजमेंट का काम किया करती थीं.
लेकिन वास्तव में पार्टी की राजनीति का नेतृत्व एक बार फिर उस परिवार के पास पहुंच गया है, जिसके इर्द गिर्द कांग्रेस ने खुद को लंबे वक़्त से बनाए रखा है.
1960 के दशक में नेहरू और इंदिरा (पिता-पुत्री), फिर 1970 के दशक में इंदिरा-संजय (मां-छोटे बेटे) और 1980 के दशक में इंदिरा-राजीव (मां-बड़े बेटे).
गांधी परिवार के बाहर से पहली बार किसी ने कांग्रेस को चलाया तो वो थे पीवी नरसिम्हा राव. उन्होंने 1996 तक कांग्रेस पार्टी और इसकी सरकार चलाई.
लेकिन 1998 में कांग्रेस के विभाजन के बाद पार्टी की खस्ता हालत को देखते हुए सोनिया गांधी को कांग्रेस की मदद के लिए आगे आना पड़ा.
1996 से 1998 तक कांग्रेस के प्रमुख रहे गांधी परिवार के वफादार सीताराम केसरी पार्टी को साथ नहीं बांध सके थे.
सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान इसलिए संभाली क्योंकि उनके परिवार के बिना पार्टी डूब रही थी और पार्टी के बिना उनके परिवार की श्रेष्ठता और प्रासंगिकता ख़तरे में थी.
यहां से, सोनिया गांधी ने 2004 के लोकसभा चुनाव तक कांग्रेस को अखण्ड रखने में कामयाबी पाई, तब वाजपेयी सरकार ने सत्ता गंवा दी थी.
इसके बाद अगला 10 साल सोनिया-राहुल (मां-बेटे) का स्वर्णिम काल रहा. लेकिन फिर 2014 में बीजेपी के नए स्टार नरेंद्र मोदी से कांग्रेस बुरी तरह हार गई.
पार्टी को सत्ता का नुकसान काफी हद तक बड़े बड़े घोटालों और भ्रष्टाचार के कारण हुआ, इसने पार्टी की छवि को बुरी तरह धूमिल कर दिया.
तब से, सोनिया-राहुल की जोड़ी ने खुद को मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी की चुनौतियों के सामने अपर्याप्त पाया. हालांकि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की चुनावी सफलता पार्टी के खुश होने के लिए पर्याप्त कारण ज़रूर हैं.
इसी सफलता को देखते हुए अब कांग्रेस के लिए बहुत कठिन 2019 लोकसभा चुनाव से पहले गांधी परिवार ने मां-बेटे की जोड़ी की जगह सोनिया-राहुल-प्रियंका की तिकड़ी को आजमाने का फ़ैसला किया है.
हम केवल यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि देश ने चुनाव से पहले सामंती वंशवादी राजनीति के एक नए अवतार को देखा है और इससे गांधी परिवार के साथ साथ कांग्रेस पार्टी का भी बनना या बिगड़ना तय है.
इस महीने की शुरुआत में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन की घोषणा से कांग्रेस पार्टी एक बार फिर संकट में है. उत्तर प्रदेश की इन पार्टियों ने देश की इस सबसे पुरानी पार्टी को नज़रअंदाज किया.
सपा और बसपा से मिले इस सबक से कांग्रेस ने शुरुआत में उत्तर प्रदेश की सभी 80 लोकसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने की घोषणा की लेकिन फिर इसने कहा कि वो अन्य समान विचारधारा वाली पार्टियों के साथ गठबंधन के लिए तैयार है.
गांधी परिवार ने 'प्रभुत्व के सिद्धांत' के अनुसार आम कार्यकर्ताओं के सामने 'पारम्परिक प्रभुत्व' को ला खड़ा किया है.
यह दिखाने के लिए कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है, पार्टी के पास एकमात्र विकल्प था कि वो प्रियंका को उतारे और बाकी का काम मीडिया का ध्यान कर देगा.
आधिकारिक रूप से पहली बार प्रियंका गांधी को पार्टी में कोई काम सौंपा गया है. अब तक, वो अपनी मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी के दो लोकसभा क्षेत्रों रायबरेली और अमेठी में चुनाव मैनेजमेंट का काम किया करती थीं.
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