राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई की बलि चढ़ गए सत्यजीत बिस्वास!
पश्चिम बंगाल के नदिया ज़िले के तृणमूल कांग्रेस विधायक सत्यजीत बिस्वास की अपने घर के पास ही सरस्वती पूजा के एक पंडाल में सरेआम हत्या ने तृणमूल और बीजेपी को भले आमने-सामने खड़ा कर दिया हो, इस हत्या के रहस्य को सुलझाना इतना आसान नहीं है.
पुलिस और ख़ुफ़िया विभाग को अभी कई सवालों के जवाब की तलाश है.
इस मामले में बीजेपी के वरिष्ठ नेता मुकुल राय के अलावा चार अन्य लोगों के ख़िलाफ़ नामज़द रिपोर्ट लिखाई गई है.
उनमें से जिन दो युवकों को गिरफ़्तार किया गया है उनको बीजेपी कार्यकर्ता बताया जा रहा है.
लेकिन मतुआ समुदाय की आबादी वाले वाले इस इलाक़े में इन दोनों दलों की लगातार तेज़ होती लड़ाई के बीच दबे-छिपे स्वरों में तृणमूल में सत्यजीत की बढ़ती लोकप्रियता और आंतरिक गुटबाज़ी की चर्चाएं भी हो रही हैं.
इलाक़े में फ़िलहाल ख़ामोशी छाई है और बड़े पैमाने पर पुलिस के जवान तैनात हैं. लेकिन हत्या की वजहों के बारे में जितने मुंह उतनी ही बातें हो रही हैं.
राजनीतिक और भौगोलिक स्थिति
इस हत्या और इसके हालात को समझने के लिए पहले इलाक़े की राजनीतिक और भौगोलिक स्थिति को समझना ज़रूरी है.
बिस्वास ज़िले के जिस कृष्णगंज क्षेत्र से विधायक थे वह जगह बांग्लादेश सीमा से लगी है. उनको जहां गोली मारी गई वह जगह सीमा से महज़ 15 किमी दूर है.
इलाक़े में देश विभाजन के बाद आने वाले मतुआ समुदाय के लोगों की बहुलता है. ख़ुद विश्वास भी मतुआ समुदाय के ही थे.
तृणमूल कांग्रेस ने उनके ज़रिए इस समुदाय के लोगों पर अपनी पकड़ बना रखी थी. लेकिन बीते साल-डेढ़ साल से ख़ासकर इस वोट बैंक पर बीजेपी की निगाहें भी थीं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी हाल में ठाकुरनगर में मतुआ समुदाय के महासम्मेलन में हिस्सा लिया था और इस तबक़े का समर्थन हासिल करने के लिए समुदाय की सबसे बड़ी नेता वीणापाणि देवी से मुलाक़ात की थी.
तृणमूल के पूर्व महासचिव रहे बीजेपी नेता मुकुल राय की भी किसी दौर में इस समुदाय पर ख़ासी पकड़ थी.
यही वजह है कि हत्या के बाद उनकी ओर अंगुलियां उठ रही हैं.
तृणमूल कांग्रेस नेताओं की दलील है कि बिस्वास की हत्या के बाद बीजेपी के लिए इस समुदाय पर पकड़ मज़बूत करना आसान हो जाता. इसी वजह से उनकी हत्या की साज़िश रची गई. अंतरराष्ट्रीय सीमा से नज़दीक होने की वजह से इलाक़े में पशु तस्करों के गिरोह भी सक्रिय थे.
ऐसे गिरोहों को सत्तारूढ़ नेताओं से संरक्षण मिलने के आरोप लगते रहे हैं. लेकिन फ़िलहाल इलाक़े के लोग इस मुद्दे पर मुंह नहीं खोलना चाहते.
एक स्थानीय व्यक्ति सुमित पाल कहते हैं, "नेताओं पर आरोप तो लगते ही रहते हैं. लेकिन क्या सच था और क्या झूठ, यह कहना मुश्किल है."
लेकिन इलाक़े में ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो मानते हैं कि बिस्वास की बढ़ती लोकप्रियता उनकी पार्टी के ही कुछ लोगों की आंखों में चुभ रही थी.
बीजेपी उन पर माफ़िया और सीमा पार पशुओं की तस्करी करने वाले गिरोहों से संबंध होने के आरोप लगाती रही है.
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "ये हत्या माफ़िया और तृणमूल की आंतरिक गुटबाज़ी का नतीजा है. हर हत्या के लिए पार्टी को ज़िम्मेदार ठहराना तृणमूल कांग्रेस की आदत बन गई है."
बिस्वास की हत्या के बाद तृणमूल को मतुआ समुदाय पर अपनी पकड़ ढीली होने का अंदेशा है. ये बात तो तय है कि इलाक़े में बीजेपी मतुआ समुदाय में पैठ बनाने का प्रयास कर रही थी.
हाल के दिनों में इस समुदाय के कई लोग निष्ठाएं बदल कर बीजेपी का समर्थन करने लगे थे. बिस्वास इस राह में सबसे बड़ी रुकावट थे.
पुलिस और ख़ुफ़िया विभाग को अभी कई सवालों के जवाब की तलाश है.
इस मामले में बीजेपी के वरिष्ठ नेता मुकुल राय के अलावा चार अन्य लोगों के ख़िलाफ़ नामज़द रिपोर्ट लिखाई गई है.
उनमें से जिन दो युवकों को गिरफ़्तार किया गया है उनको बीजेपी कार्यकर्ता बताया जा रहा है.
लेकिन मतुआ समुदाय की आबादी वाले वाले इस इलाक़े में इन दोनों दलों की लगातार तेज़ होती लड़ाई के बीच दबे-छिपे स्वरों में तृणमूल में सत्यजीत की बढ़ती लोकप्रियता और आंतरिक गुटबाज़ी की चर्चाएं भी हो रही हैं.
इलाक़े में फ़िलहाल ख़ामोशी छाई है और बड़े पैमाने पर पुलिस के जवान तैनात हैं. लेकिन हत्या की वजहों के बारे में जितने मुंह उतनी ही बातें हो रही हैं.
राजनीतिक और भौगोलिक स्थिति
इस हत्या और इसके हालात को समझने के लिए पहले इलाक़े की राजनीतिक और भौगोलिक स्थिति को समझना ज़रूरी है.
बिस्वास ज़िले के जिस कृष्णगंज क्षेत्र से विधायक थे वह जगह बांग्लादेश सीमा से लगी है. उनको जहां गोली मारी गई वह जगह सीमा से महज़ 15 किमी दूर है.
इलाक़े में देश विभाजन के बाद आने वाले मतुआ समुदाय के लोगों की बहुलता है. ख़ुद विश्वास भी मतुआ समुदाय के ही थे.
तृणमूल कांग्रेस ने उनके ज़रिए इस समुदाय के लोगों पर अपनी पकड़ बना रखी थी. लेकिन बीते साल-डेढ़ साल से ख़ासकर इस वोट बैंक पर बीजेपी की निगाहें भी थीं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी हाल में ठाकुरनगर में मतुआ समुदाय के महासम्मेलन में हिस्सा लिया था और इस तबक़े का समर्थन हासिल करने के लिए समुदाय की सबसे बड़ी नेता वीणापाणि देवी से मुलाक़ात की थी.
तृणमूल के पूर्व महासचिव रहे बीजेपी नेता मुकुल राय की भी किसी दौर में इस समुदाय पर ख़ासी पकड़ थी.
यही वजह है कि हत्या के बाद उनकी ओर अंगुलियां उठ रही हैं.
तृणमूल कांग्रेस नेताओं की दलील है कि बिस्वास की हत्या के बाद बीजेपी के लिए इस समुदाय पर पकड़ मज़बूत करना आसान हो जाता. इसी वजह से उनकी हत्या की साज़िश रची गई. अंतरराष्ट्रीय सीमा से नज़दीक होने की वजह से इलाक़े में पशु तस्करों के गिरोह भी सक्रिय थे.
ऐसे गिरोहों को सत्तारूढ़ नेताओं से संरक्षण मिलने के आरोप लगते रहे हैं. लेकिन फ़िलहाल इलाक़े के लोग इस मुद्दे पर मुंह नहीं खोलना चाहते.
एक स्थानीय व्यक्ति सुमित पाल कहते हैं, "नेताओं पर आरोप तो लगते ही रहते हैं. लेकिन क्या सच था और क्या झूठ, यह कहना मुश्किल है."
लेकिन इलाक़े में ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो मानते हैं कि बिस्वास की बढ़ती लोकप्रियता उनकी पार्टी के ही कुछ लोगों की आंखों में चुभ रही थी.
बीजेपी उन पर माफ़िया और सीमा पार पशुओं की तस्करी करने वाले गिरोहों से संबंध होने के आरोप लगाती रही है.
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "ये हत्या माफ़िया और तृणमूल की आंतरिक गुटबाज़ी का नतीजा है. हर हत्या के लिए पार्टी को ज़िम्मेदार ठहराना तृणमूल कांग्रेस की आदत बन गई है."
बिस्वास की हत्या के बाद तृणमूल को मतुआ समुदाय पर अपनी पकड़ ढीली होने का अंदेशा है. ये बात तो तय है कि इलाक़े में बीजेपी मतुआ समुदाय में पैठ बनाने का प्रयास कर रही थी.
हाल के दिनों में इस समुदाय के कई लोग निष्ठाएं बदल कर बीजेपी का समर्थन करने लगे थे. बिस्वास इस राह में सबसे बड़ी रुकावट थे.
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