रेलवे की बदहाली के लिए कौन ज़िम्मेदार?

भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (कैग) ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि भारतीय रेल की माली हालत साल 2018 में बीते 10 सालों की तुलना में सबसे ख़राब थी.

सोमवार को संसद में पेश की गई ये रिपोर्ट भारतीय रेल में सुधार किए जाने पर ज़ोर देती है.

ये रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने रेल मंत्री पीयूष गोयल समेत केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया है.

कांग्रेस पार्टी ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से लिखा है, "साल 2017-18 में भारतीय रेल का प्रदर्शन पिछले 10 सालों की तुलना में सबसे ख़राब रहा है. भारत के सबसे ज़्यादा रोज़गार पैदा करने वाला संस्थान हर सौ रुपये कमाने के लिए 98.44 रुपए ख़र्च कर रहा है. ये इस बात का सबसे सटीक उदाहरण है कि बीजेपी ने इस तरह भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी से उतार दिया है."

कैग ने अपनी इस रिपोर्ट में ये बताने की कोशिश की है कि एक संस्था के रूप में भारतीय रेल की आर्थिक हालत कैसी है.

रिपोर्ट बताती है कि साल 2017-18 में भारतीय रेल को अपनी सेवाओं के बदले में 98.44 रुपए ख़र्च करके 100 रुपए मिले हैं.

जबकि साल 2015-16 में रेलवे को 90.49 रुपए ख़र्च करके 100 रुपए की कमाई होती थी.

रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि रेलवे ने फिलहाल एनटीपीसी और इरकॉन से कुछ परियोजनाओं के लिए एडवांस लिया हुआ है.

इस वजह से रेलवे का ऑपरेटिंग रेशियो 98.44 पर टिक गया है. अगर ऐसा नहीं होता तो ये स्थिति 102.66 तक पहुंच सकती थी.

साल 2016-17 में इस कमाई के चलते रेलवे को 4,913 करोड़ रुपए की अतिरिक्त आय हुई थी.

लेकिन साल 2017-18 में यही अतिरिक्त आय 66 फ़ीसदी की कमी के साथ 1,665 करोड़ रुपए रह गई.

भारतीय रेल को माल ढुलाई और यात्री किराए समेत तमाम दूसरे मदों से आमदनी होती है. इनमें से सबसे ज़्यादा आय माल ढुलाई से होती है.

वहीं, रेलवे अपने यात्रियों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने के लिए किराया लेती है.

वरिष्ठ पत्रकार श्रीनद झा मानते हैं कि रेलवे की बदहाली की वजह यात्री किराए में ही समाई हुई है.

झा कहते हैं, "बीते 10 सालों से रेलवे ने यात्री किराए में उल्लेखनीय बढ़ोतरी नहीं की है. क्योंकि ये ऐसा मुद्दा है जो सरकारों को राजनीतिक रूप से प्रभावित करता है. सरकार ने एक बार उपनगरीय रेल में किराया बढ़ाने का फ़ैसला किया था. लेकिन इसके बाद इस फ़ैसले के प्रति विरोध प्रदर्शन होने की वजह से सरकार को बढ़ा हुआ किराया वापस लेना पड़ा."

"ऐेसे में राजनीतिक पार्टियों के लिए यात्री रेलगाड़ियों का किराया बढ़ाना जोख़िम से भरा फ़ैसला बन जाता है. ये एक ऐसा राजनीतिक मुद्दा है जिसका असर रेलवे की बदहाली के रूप में सामने आता है. क्योंकि अब तक बीती सरकारें यात्री सेवाओं के किराए बढ़ाने के मुद्दे पर कन्नी काटती दिखी हैं"

"साल 2016 में जब एनडीए सरकार ने रेल बजट को समाप्त किया था तो ये कहा गया था कि पुरानी सरकारों की तुष्टिकरण की नीतियों को हम ख़त्म करना चाहते हैं. लेकिन इस सरकार ने भी अपने कहे के मुताबिक़ किरायों में बढ़ोतरी नहीं की."

भारतीय रेलवे इस समय जिन इंजनों, रेल के डिब्बों, सिग्नल व्यवस्था आदि का इस्तेमाल कर रही है, वे मौजूदा ज़रूरतों के लिहाज़ से काफ़ी पुराने हो चुके हैं.

ऐसे में रेलवे को अपने आधारभूत ढांचे का आधुनिकीकरण करने की ज़रूरत है.

लेकिन रेलवे अपनी कमाई का 95 फ़ीसदी पैसा यात्री किरायों की सब्सिडी में ख़र्च करती है.

श्रीनद झा बताते हैं, "रेलवे को हर साल यात्री रेलगाड़ियों में 35000 करोड़ रुपए का घाटा होता है. रेलवे को फ्रेट कैरियर से जो भी हासिल होता है, उसे यात्री सेवाओं को सब्सिडी देने में इस्तेमाल किया जाता है. अगर पिछले 10-15 सालों में हर साल थोड़ा-थोड़ा किराया भी बढ़ा होता तो ऐसी स्थिति नहीं होती."

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